सम्पूर्ण श्री काकभुसुंडि रामायण

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देनाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज। आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु केहि काज। सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस। जेहि कै अस्तुति सादर निज मुख कीन्ह महेस ।।

 

सुनहु तात जेहि कारन आयउँ । सो सब भयउ दरस तव पायउँ ॥ देखि परम पावन तव आश्रम । गयउ मोह संसय नाना भ्रम ॥ अब श्रीराम कथा अति पावनि । सदा सुखद दुख पुंज नसावनि ॥ सादर तात सुनावहु मोही । बार बार बिनवउँ प्रभु तोही ॥ सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता । सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता ॥ भयउ तासु मन परम उछाहा । लाग कहै रघुपति गुन गाहा ॥ प्रथमहिं अति अनुराग भवानी । रामचरित सर कहेसि बखानी ॥ पुनि नारद कर मोह अपारा । कहेसि बहुरि रावन अवतारा ॥

 

प्रभु अवतार कथा पुनि गाई। तब सिसु चरित कहेसि मन लाई ॥ दोहा : बालचरित कहि बिबिधि बिधि, मन महँ परम उछाह। रिषि आगवन कहेसि पुनि, श्रीरघुबीर बिबाह ॥

 

बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा बिपिन गवन केवट अनुरागा। बालमीक प्रभु मिलन बखाना । सचिवागवन नगर नृप मरना । करि नृप क्रिया संग पुरबासी । पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए भरत रहनि सुरपति सुत करनी ।

 

पुनि नृप बचन राज रस भंगा ॥ । कहेसि राम लछिमन संबादा ॥ सुरसरि उतरि निवास प्रयागा ॥ चित्रकूट जिमि बसे भगवाना ॥ भरतागवन प्रेम बहु बरना ॥ भरत गए जहाँ प्रभु सुख रासी ॥ । लै पादुका अवधपुर आए ॥ प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी ॥

 

दोहा : कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग। बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग ॥

 

गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई ॥ भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा ॥

 

कहि दंडक बन पावनताई । पुनि प्रभु पंचबटीं कृत बासा । पुनि लछिमन उपदेस अनूपा । सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा ॥ खर दूषन बध बहुरि बखाना । जिमि सब मरमु दसानन जाना ॥ दसकंधर मारीच बतकही । जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही ॥ पुनि माया सीता कर हरना । श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना ॥

पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्हीं। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही ॥

 

 

बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा । जेहि बिधि गए सरोबर तीरा ॥

 

दोहा : प्रभु नारद संबाद कहि मारुति मिलन प्रसंग। पुनि सुग्रीव मिताई बालि प्रान कर भंग ॥ कपिहि तिलक करि प्रभु कृत सैल प्रबरषन बास। बरनन बर्षा सरद अरु राम रोष कपि त्रास ॥

 

जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए ।

 

बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती ।

 

कपिन्ह बहोरि मिला संपाती

 

सुनि सब कथा समीरकुमारा । लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा

 

नाघत भयउ पयोधि अपारा

 

बन उजारि रावनहि प्रबोधी ।

 

। पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा ।। पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी

 

 

 

आए कपि सब जहँ रघुराई ।

 

बैदेही की कुसल सुनाई उतरे जाइ बारिनिधि तीरा 11 11

 

सेन समेति जथा रघुबीरा ।

 

मिला बिभीषन जेहि बिधि आई ।

 

सीता खोज सकल दिसि धाए ।

 

सागर निग्रह कथा सुनाई 11

 

दोहाः सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार। गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार ॥ निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिधि प्रकार। कुंभकरन घननाद कर बल पौरुष संघार।।

 

निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना ॥

 

रावन बध मंदोदरि सोका । राज बिभीषन देव असोका ॥

 

सीता रघुपति मिलन बहोरी ।

 

पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता

 

जेहि बिधि राम नगर निज आए । ।

 

कहेसि बहोरि राम अभिषेका ।

 

कथा समस्त भुसुंड बखानी ।

 

सुनि सब राम कथा खगनाहा ।

 

सुरन्ह कीन्हि अस्तुति कर जोरी ॥

 

अवध चले प्रभु कृपा निकेता ॥

 

बायस बिसद चरित सब गाए ॥

 

पुर बरनत नृपनीति अनेका ॥

 

जो मैं तुम्ह सन कही भवानी ॥

 

कहत बचन मन परम उछाहा ।।

 

सोरठाः गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति चरित। भयउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक ॥

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