माँ गंगा की महिमा ?

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श्री महादेव जी ने देवर्षि नारद से कहा- मुनिश्रेष्ठ !. जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर अवहेलना पूर्वक भी गङ्गाजीका स्मरण करता है, उसे तीनों लोकों में किसी से भी अमङ्गल होने का भय नहीं रहता। किसी क्रिया के आरम्भ म याद कोई त्रैलोक्यपावनी देवी गङ्गा का स्मरण करता है तो अविधि पूर्वक भी की गयी वह क्रिया सफल हो जाती है। जो पुण्य सभी तीर्थों में किये गये स्नान, दर्शन, सभी देवताओं के पूजन से नहीं होता है, वैसा पुण्य गङ्गा के स्मरण मात्र से प्राप्त हो जाता है। जिस दिन गङ्गाका स्मरण नहीं किया जाता है, वही दिन दुर्दिन है, मेघ छाये हों, वह दिन दुर्दिन नहीं है। गङ्गा स्नान के निमित्त जाने वाले मनुष्य के सभी पितृगण प्रसन्न होकर नाचने लगते हैं और उसके महानिन्दनीय पाप भी दूर से ही भाग जाते हैं। गङ्गा के दर्शन मात्र से जब सभी देवता, ऋषि तथा महात्मा कृतार्थ हो जाते हैं तो फिर मनुष्यों की क्या बात है? गङ्गा का स्मरण करते हुए दूसरे जल में भी यदि कोई स्नान करता है तो वह वहाँ भी गङ्गा स्नान से प्राप्त होने वाले पुण्य के समान पुण्य को प्राप्त करता है। मुनिश्रेष्ठ ! जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल गङ्गा के जल में स्नान करता है, उस पुण्यात्मा को साक्षात् दूसरे शिव के समान ही समझना चाहिये। जो लोग एकाग्रचित्त होकर गङ्गामें पितरों का तर्पण करते हैं, उनके पितृ निर्विकार ब्रह्मलोक पहुँच जाते हैं। गङ्गा के जल में पकाया हुआ अन्न देवताओंको भी दुर्लभ है। उस अन्न से श्राद्ध किये जाने पर पितरों को परमानन्द प्राप्त होता है। भूलकर भी मनुष्य को गङ्गा में मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिये। गङ्गा में मल-मूत्र का विसर्जन करने वाला व्यक्ति, जब तक चौदह इन्द्रों के भोग का काल रहता है, तब तक अर्थात् एक कल्पतक नरक में वास करता ।

जो पुरुष जलरूपिणी, पूर्णा, प्रकृतिमयी तथा साक्षात् ब्रह्म स्वरूपिणी महादेवी भगवती गङ्गाको अज्ञानवश ‘नदी’ ऐसा मानता है, वह अनेक नरकों में जाता है। आदिशक्ति ही प्राणियों की रक्षा के लिये द्रवरूप में प्रकट हुई हैं-ऐसी भावना करनी चाहिये ।। मुने ! पुत्र, मित्र तथा स्त्री आदि कोई भी ‘बन्धु’ नहीं हैं, इस संसार से मुक्त करने वाली भगवती गङ्गा ही परम बन्धु हैं। दर्शन, स्पर्श, नाम-कीर्तन तथा ध्यान करने से सुख और मोक्ष प्रदान करने वाली भगवती गङ्गा परम बन्धु कही गयी हैं। गङ्गा ही परम बन्धु हैं, गङ्गा ही परम सुख हैं, गङ्गा ही परम धन हैं और गङ्गा ही परम गति हैं।

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